ग्रीन गुफा पर पर्यटन को झटका: हाईकोर्ट ने कहा—राज्य जनता से गुफा को बचाना जारी रख सकता है, 18 फरवरी को अगली सुनवाई

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रायपुर/बिलासपुर -:कांकेर वैली नेशनल पार्क स्थित ऐतिहासिक व अत्यंत संवेदनशील ग्रीन गुफा को पर्यटन के लिए खोलने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार ऐसे कदम उठा सकती है,

 

जिनसे गुफा की विरासत और पारिस्थितिकी को आम जनता से होने वाले खतरे से बचाया जा सके। साथ ही कोर्ट ने कांकेर वैली नेशनल पार्क के संचालक से शपथपत्र तलब करते हुए 18 फरवरी 2026 को अगली सुनवाई तय की है।

 

सुनवाई के दौरान शासन की ओर से कोर्ट को बताया गया कि गुफा के भीतर कुछ लोग नाम खोदने जैसी गतिविधियां कर रहे हैं, जिससे गुफा को नुकसान पहुंच रहा है। इसी कारण संरक्षण की दृष्टि से गुफा के बाहर निर्माण कार्य कराया जा रहा है। इस पर कोर्ट ने माना कि गुफा की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं, बशर्ते उससे विरासत को खतरा न हो।

 

याचिकाकर्ता रायपुर निवासी नितिन सिंघवी की ओर से कोर्ट को बताया गया कि वन विभाग पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ग्रीन गुफा के प्रवेश द्वार, सीढ़ी, पाथवे सहित अन्य संरचनाओं का निर्माण करा रहा है। उन्होंने बताया कि 24 दिसंबर 2025 को हुई वन विभाग की बैठक में कांकेर वैली नेशनल पार्क के संचालक द्वारा पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से गुफा को पर्यटन के लिए खोलने की योजना रखी गई थी।

 

इस बैठक में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) ने जनवरी के अंत तक गुफा को पर्यटकों के लिए खोलने तथा साइनेज, फोटो-वीडियो के जरिए व्यापक प्रचार-प्रसार के निर्देश दिए थे।

BSIP की कड़ी चेतावनी: बिना वैज्ञानिक अध्ययन पर्यटन विनाशकारी

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि इस संबंध में भारत सरकार की संस्था बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज़ (BSIP), लखनऊ से विशेषज्ञ राय ली गई थी। BSIP के निदेशक डॉ. महेश जी. ठक्कर ने अपनी राय में कहा कि गुफा के प्रवेश द्वार के पास रेत, बजरी और लोहे की छड़ों जैसी निर्माण सामग्री का उपयोग गंभीर रूप से चिंताजनक है।

 

उन्होंने चेताया कि ऐसे सिविल कार्यों से प्राकृतिक ड्रेनेज, सीपेज, वायु प्रवाह, माइक्रोक्लाइमेट और रासायनिक संतुलन प्रभावित हो सकता है, जिससे गुफा के इकोसिस्टम को अपरिवर्तनीय क्षति पहुंच सकती है।

 

डॉ. ठक्कर ने स्पष्ट कहा कि विस्तृत बहुविषयक वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के बिना ग्रीन गुफा को आम जनता के लिए खोलना वैज्ञानिक दृष्टि से गंभीर भूल होगी।

 

ग्रीन गुफाएं सबसे नाजुक प्राकृतिक प्रणालियों में से एक

BSIP की राय में यह भी कहा गया कि ग्रीन गुफाएं पृथ्वी की सबसे नाजुक और संवेदनशील प्रणालियों में आती हैं। चूना-पत्थर की ये गुफाएं हजारों-लाखों वर्षों में विकसित होती हैं और एक बार यदि इनका संतुलन बिगड़ा, तो मानव समय-सीमा में इनका पुनर्स्थापन लगभग असंभव है।

डॉ. ए.के. पति की राय: पर्यटन नहीं, केवल अनुसंधान के लिए सुरक्षित रखें

पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. ए. के. पति ने भी लिखित राय में कहा कि कांकेर वैली की गुफाएं, विशेषकर ग्रीन केव, अत्यंत नाजुक और वैज्ञानिक रूप से अमूल्य हैं।

 

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ग्रीन गुफा को पर्यटन के बजाय केवल वैज्ञानिक अनुसंधान और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए। उनकी यह राय भी कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की गई।

 

अब इस मामले में सभी की निगाहें 18 फरवरी 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि ग्रीन गुफा का भविष्य संरक्षण के रास्ते पर जाएगा या पर्यटन के दबाव में।

थनेश्वर बंजारे
Author: थनेश्वर बंजारे

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