टेंगनाभाठा के 9 किसानों की मुआवजा राशि विभागीय फाइलों में कैद
अन्नदाता की जमीन पर बनी नहर,हक से वंचित—जल संसाधन व राजस्व विभाग की लापरवाही उजागर
गरियाबंद/छुरा-:विकास के नाम पर अपनी उपजाऊ भूमि त्यागने वाले टेंगनाभाठा (टेंगनाही) ग्राम के 9 किसान आज लगभग 48 लाख रुपये की मुआवजा राशि के लिए 10 से 12 वर्षों से भटक रहे हैं। टेंगनाही जलाशय के नहर–नाली निर्माण में जिन किसानों की जमीन अधिग्रहित हुई, उन्हें आज तक उनका वैधानिक मुआवजा नहीं मिला है।किसानों की यह पीड़ा अब सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि विभागीय लापरवाही का गंभीर उदाहरण बन चुकी है।
फाइलें विभागों के बीच फंसी… किसान चक्कर लगाते-लगाते थक गए
किसानों ने कई बार जल संसाधन विभाग में आवेदन लगाए, दर्जनों बार राजस्व विभाग के दफ्तर पहुंचे, पर जवाब वही पुराने—
“फाइल आगे भेज दी जाएगी… प्रक्रिया में है…” जल संसाधन विभाग के कर्मचारियों ने किसानों को बताया कि उनकी फाइल अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व गरियाबंद के पास वर्षों से लंबित है।
किसानों का कहना है कि—
“किस अधिकारी ने फाइल रोकी? किसने जिम्मेदारी निभाई नहीं? कोई बताने को तैयार नहीं! बस हमें इधर से उधर भेजते रहे।”
जमीन गई… मुआवजा नहीं मिला… किसान कर्ज और संकट में फंसे
ग्राम पिपराही पंचायत अंतर्गत टेंगनाभाठा के इन किसानों की जमीन नहर निर्माण में चली गई, जिससे कृषि उत्पादन पर गहरा असर पड़ा।
कई किसान खेती की वैकल्पिक व्यवस्था करने में विफल रहे और आज आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।
किसानों का दुख—
“नहर तो हमारा खेत काटकर सीधी निकल गई, लेकिन हमारी मुआवजा राशि आज तक कागजों में ही अटकी है।”
कलेक्टर कार्यालय में शिकायत—किसानों ने मांगी तत्काल हस्तक्षेप
लगातार विभागीय भटकाव और अनदेखी से परेशान किसानों ने हाल ही में कलेक्टर गरियाबंद को ज्ञापन सौंपा, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया—
12 साल से लंबित मुआवजा राशि का तत्काल भुगतान किया जाए
जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर कार्रवाई की जाए
किसानों को गुमराह करने और फाइल रोकने वाली प्रणाली की जांच हो कलेक्टर कार्यालय द्वारा शीघ्र निराकरण का आश्वासन दिया गया, लेकिन किसानों के मन में अब भी संशय है।
बड़ा सवाल—अन्नदाता को 12 साल भटकाने के लिए कौन जिम्मेदार?
टेंगनाभाठा के ग्रामीणों में विभागीय कार्यशैली पर भारी नाराजगी है।
ग्रामवासियों का कहना है—
“अन्नदाता को 12 साल तक धुलाई खिलाई गई। विभागों ने बस फाइलें आगे-पीछे कीं, लेकिन हमारा हक नहीं दिया।”
किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द मुआवजा प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो वे बड़े आंदोलन के लिए मजबूर हो जाएंगे।
किसानों की अंतिम अपील—“अब प्रशासन ही हमारी सुनवाई करे”
लगातार आर्थिक, मानसिक और सामाजिक दबाव झेल रहे किसान अब प्रशासनिक कार्रवाई के इंतजार में हैं।
हर किसान का सवाल आज यही है—
“क्या हमारी लगभग 48 लाख की राशि हमें मिलेगी?
या फिर अगले 10 साल भी कागजों में ही फंसी रहेगी?”
अब पूरा मामला कलेक्टर स्तर पर पहुंच चुका है।
देखना यह है कि प्रशासन अन्नदाताओं की इस 12 साल पुरानी पीड़ा को कब राहत में बदलता है।
Author: थनेश्वर बंजारे
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