हड़ताल, अव्यवस्था और कमजोर वैकल्पिक तैयारी ने सरकार के दावों की पोल खोली — 90% सोसायटियाँ बंद, किसानों में गहरी नाराज़गी
गरियाबंद -:छत्तीसगढ़ में इस वर्ष धान खरीदी की शुरुआत पर शासन ने बड़े स्तर पर पूजा-अर्चना और शुभारंभ कार्यक्रम आयोजित किए, लेकिन जमीनी हालात इन दावों से बिल्कुल विपरीत हैं। शुभारंभ तो हो गया, पर खरीदी ठप पड़ी है।
15 नवंबर से प्रदेशभर में खरीदी प्रारंभ होने की घोषणा की गई थी, लेकिन कर्मचारियों की हड़ताल और प्रशासन की कमजोर तैयारी ने संपूर्ण प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया है।
प्रदेश के अधिकांश जिलों में खरीदी केंद्रों पर व्यवस्थाएँ पूरी तरह चरमरा चुकी हैं। करीब 90% सोसायटियाँ बंद हैं, जबकि कुछ केंद्रों पर सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से तुलाई की गई। किसानों की भीड़ लगातार बढ़ रही है, लेकिन केंद्रों में कर्मचारी, तौल व्यवस्था, बारदाना और रजिस्टर तक उपलब्ध नहीं हैं।
गरियाबंद जिले की हालत और अधिक गंभीर है। सुदूर अंचलों में न तो कर्मचारियों की उपस्थिति है और न ही टोकन वितरण की प्रक्रिया शुरू हो पाई है। कई सोसायटियों में अब तक कोई तैयारी नहीं दिख रही। किसान सुबह से शाम तक केंद्रों के चक्कर काट रहे हैं, पर उन्हें लौटना पड़ रहा है।
ऑनलाइन टोकन व्यवस्था भी पूरी तरह गड़बड़ा गई है। सर्वर की समस्या, टोकन कटने में कठिनाई और इंटरनेट अव्यवस्था से किसान बेहद परेशान हैं। कई किसानों ने बताया कि उन्होंने रातभर इंटरनेट चलाने की कोशिश की लेकिन टोकन नहीं मिल पाया।
किसानों ने सवाल उठाते हुए कहा कि—
“जब कर्मचारियों की हड़ताल पहले से थी, तो सरकार ने समय रहते प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की? शुभारंभ से पहले पूजा हो गई, लेकिन खरीदी शुरू होने की वास्तविक तैयारी क्यों नहीं हुई?”
मौसम की मार झेल चुके किसान अब सरकारी अव्यवस्था की दूसरी मार झेल रहे हैं। कटाई के बाद किसान खरीदी की आशा में थे, लेकिन शुभारंभ की रस्म अदायगी के अलावा जमीनी तैयारी शून्य दिख रही है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ रहा है और रबी फसल की तैयारी भी प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञों और किसानों की संयुक्त राय है कि वैकल्पिक व्यवस्था पूरी तरह असफल साबित हुई है।
सरकार द्वारा तुरंत बनाई गई व्यवस्थाएँ सिर्फ कागजों में दिख रही हैं, जबकि जमीन पर खरीदी प्रक्रिया ठप पड़ी है।
फिलहाल कर्मचारी हड़ताल पर हैं और खरीदी के नियमित संचालन को लेकर प्रशासन भी अनिश्चित नजर आ रहा है।
किसान अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि व्यवस्था जल्द सुधरेगी, लेकिन अभी हालात यह बता रहे हैं कि खरीदी का शुभारंभ तो हुआ है,
पर खरीदी शुरू नहीं हो पाई — और इसका पूरा भार किसान की ही पीठ पर पड़ा है।
Author: थनेश्वर बंजारे
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