छत्तीसगढ़ /बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले के एक पुराने और रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले में कड़ा रुख अपनाया है।
मामला एक ऐसे ‘फर्जी एनकाउंटर’ से जुड़ा है, जिसमें पुलिस ने एक निर्दोष ग्रामीण को ‘नक्सली’ बताकर मौत के घाट उतार दिया था। अब, इस घटना के दशकों बाद, मृतक की पत्नी द्वारा मुआवजे की मांग पर हाईकोर्ट ने जशपुर कलेक्टर को 45 दिनों के भीतर निर्णय लेने का सख्त निर्देश दिया है।
नक्सली नहीं, निर्दोष था रामनाथ : जांच में खुली थी पोल -याचिकाकर्ता श्रीमती संझो बाई के अनुसार, उनके पति रामनाथ राम (नागवंशी) को कांसबेल पुलिस ने एक फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था। पुलिस ने उन्हें खूंखार नक्सली बताया था, लेकिन न्यायिक जांच ने खाकी के इस झूठ का पर्दाफाश कर दिया।
जांच में यह साबित हुआ कि रामनाथ नक्सली नहीं थे, जिसके बाद दोषी पुलिसकर्मियों पर मुकदमा चला। सत्र न्यायालय ने 11 जून 2002 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए :
* तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) एच.आर. अहिरवार को धारा 304-1 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषी करार दिया।
* 5 अन्य पुलिसकर्मियों को धारा 323/34 के तहत सजा सुनाई।
मुआवजे के लिए सालों से भटक रही है विधवा :दोषियों को सजा मिलने के बावजूद, पीड़ित परिवार आज भी सरकारी मदद और मुआवजे के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। संझो बाई ने 24 सितंबर 2024 को कलेक्टर जशपुर के समक्ष मुआवजे के लिए आवेदन दिया था, लेकिन प्रशासन की फाइलों में वह आवेदन दबा रह गया। हार मानकर महिला ने हाईकोर्ट की शरण ली।
हाईकोर्ट का आदेश : 45 दिन में करें फैसलाजस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश दिया है कि :
* कलेक्टर जशपुर याचिकाकर्ता के लंबित आवेदन पर अगले 45 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से निर्णय लें।
* याचिकाकर्ता को 15 दिनों के भीतर पुन: आवेदन और हाईकोर्ट के आदेश की प्रति कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत करने की छूट दी गई है।
Author: थनेश्वर बंजारे
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