कलेक्टर बोले – नियमों के विरुद्ध संभाला पदभार, नोटिस जारी… पर क्या शासकीय सेवा आचरण में इसकी अनुमति?
गरियाबंद-:मैनपुर एसडीएम प्रकरण अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह मामला शासकीय सेवा नियम, अनुशासन और न्यायिक प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है। डिप्टी कलेक्टर तुलसी मरकाम पर अश्लील डांस कार्यक्रम में शामिल होने, मंच के सामने नोट उड़ाने और हाथ पकड़कर डांस करने के आरोपों के बाद की गई कार्रवाई अब नए मोड़ पर है।अश्लील कार्यक्रम में मौजूदगी – क्या यह सेवा आचरण नियमों के अनुरूप?
सूत्रों के अनुसार, जिस कार्यक्रम को केवल “अनुमति प्राप्त सांस्कृतिक आयोजन” बताया गया था, उसी मंच के सामने एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा खुलेआम नोट उड़ाना और डांसर के साथ हाथ पकड़कर नृत्य करना क्या छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम के तहत स्वीकार्य है?

क्या कोई भी शासकीय अधिकारी सार्वजनिक मंच पर इस प्रकार की गतिविधि में शामिल हो सकता है?
यदि यह आचरण अनुचित है, तो फिर केवल अनुमति के आधार पर क्या पूरा मामला हल्का माना जा सकता है?
*निलंबन, अटैचमेंट और हाईकोर्ट से स्टे – किस आधार पर राहत*
11 जनवरी को एसडीएम पद से हटाकर जिला कार्यालय अटैच किया गया।
16 जनवरी को निलंबन आदेश जारी हुआ और बलौदाबाजार में अटैच किया गया।
29 जनवरी को निलंबन आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट से स्टे मिल गया।
लेकिन स्टे मिलने के बाद 30 जनवरी को सीधे पुनः मैनपुर एसडीएम का कार्यभार संभाल लेना – क्या यह प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप था?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है –
👉 क्या हाईकोर्ट ने केवल निलंबन पर रोक लगाई थी?
👉 फिर एसडीएम पद पर पुनः पदस्थापना का स्पष्ट आदेश भी दिया था?
यदि केवल निलंबन पर स्टे था, तो पदस्थापना का अधिकार किसके पास है? शासन या स्वयं अधिकारी?
*कलेक्टर का बयान – “नियम विरुद्ध संभाला पदभार”*
कलेक्टर बी.एस. उइके ने स्पष्ट कहा है कि
“डिप्टी कलेक्टर तुलसी मरकाम ने नियमों के विरुद्ध कार्यभार संभाला है। इस संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और सामान्य प्रशासन विभाग को जानकारी भेजी जा रही है।”
इस बयान से साफ है कि जिला प्रशासन भी इस कदम को नियमों के विपरीत मान रहा है।
लेकिन बड़ा प्रश्न यह है –
यदि नियमों का उल्लंघन हुआ, तो क्या केवल नोटिस पर्याप्त है?
या फिर सेवा आचरण अधिनियम के तहत कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए?
*कानून में क्या है प्रावधान?*
सिविल सेवा आचरण नियमों के अनुसार कोई भी शासकीय कर्मचारी ऐसा आचरण नहीं कर सकता जिससे शासन की छवि धूमिल हो। सार्वजनिक मंच पर अश्लील गतिविधि में संलिप्तता, नोट उड़ाना और अनुचित व्यवहार “अनुशासनहीनता” की श्रेणी में आ सकता है।
ऐसे मामलों में विभागीय जांच, निलंबन और सेवा शर्तों के तहत दंड का प्रावधान है।
अब सवाल यह भी है –
यदि हाईकोर्ट ने किसी तकनीकी आधार पर स्टे दिया है, तो क्या वह आचरण को वैध ठहराता है?
केवल प्रक्रिया में त्रुटि होने पर राहत देता है?
*भविष्य के लिए खतरे की घंटी?*
यदि इस प्रकार की घटनाओं में शामिल अधिकारी बिना ठोस स्पष्टीकरण के पुनः पदभार संभालते हैं, तो क्या यह अन्य अधिकारियों के लिए उदाहरण नहीं बनेगा?
क्या भविष्य में कोई भी अधिकारी “अनुमति प्राप्त कार्यक्रम” की आड़ में इस तरह की गतिविधियों में शामिल होकर कानूनी राहत ले सकता है?
प्रशासन को अब स्पष्ट करना होगा कि –
✔️ क्या केवल निलंबन पर स्टे से पद स्वतः बहाल हो जाता है?
✔️ क्या पदभार संभालने से पहले शासन की स्वीकृति अनिवार्य Vlog है?
✔️ और क्या अशोभनीय आचरण पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी?
यह मामला केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक मर्यादा और कानून की गरिमा का है।
आम जनता देख रही है कि नियमों के विरुद्ध आचरण पर कार्रवाई होती है या केवल कागजी नोटिस जारी कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
Author: थनेश्वर बंजारे
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