गरियाबंद-:जिले के बहुचर्चित किडनी प्रभावित ग्राम सुपेबेड़ा की दर्दनाक सच्चाई एक बार फिर प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर कर रही है। पाँच वर्ष पहले यहाँ दो शिक्षकों की किडनी रोग से मौत हुई थी। राज्यपाल से लेकर स्वास्थ्य मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों ने दौरे किए, राहत और पुनर्वास के बड़े-बड़े दावे हुए, लेकिन उन वादों की हकीकत आज भी धरातल पर नहीं दिखती।
राज्यपाल के निर्देश और मौखिक नियुक्ति
मृत शिक्षकों के परिजनों को राहत देने तत्कालीन राज्यपाल अनुसुइया उइके ने गरियाबंद कलेक्टर को निर्देश दिए थे कि दोनों शिक्षकों की पत्नी को जनपद पंचायत देवभोग में नियुक्ति दी जाए। राज्यपाल के आदेश पर दोनों महिलाओं को मौखिक रूप से जनपद पंचायत में रखा भी गया, और उन्होंने आठ महीने तक काम किया — कभी जनपद कार्यालय में, तो कभी मनरेगा शाखा में।
आठ महीने काम के बाद प्रशासन ने निकाला बाहर
आठ महीने काम कराने के बाद अचानक प्रशासन ने फंड डिफेक्ट का हवाला देते हुए दोनों को काम से निकाल दिया। अब तक सिर्फ पाँच महीने का मानदेय मिला है, बाकी तीन महीनों के लिए वे दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं।
परिवार को ना पेंशन, ना अनुकंपा नियुक्ति
मृत शिक्षाकर्मियों का संविलियन भी नहीं हुआ था, इसलिए परिवार को न तो पेंशन की सुविधा मिली, न अनुकंपा नियुक्ति। इलाज में सारी जमा पूंजी खर्च हो जाने के बाद अब सुपेबेड़ा की इन महिलाओं के सामने रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलाना भी चुनौती बन गया है।
राज्यपाल के आदेश की अवहेलना ने खोली प्रशासन की पोल
राज्यपाल के निर्देशों का पालन न होना प्रशासन की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण है। सुपेबेड़ा की इन पीड़ित महिलाओं ने अब राज्यपाल तक अपनी आवाज़ पहुँचाने का फैसला किया है। वे राज्यपाल से न्याय की गुहार लगाने के साथ ही गरियाबंद के अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करेंगी।
न्याय के लिए अब राज्यपाल तक जाएगी लड़ाई
परिजनों का कहना है कि जिस राज्यपाल ने राहत देने के आदेश दिए, उन्हीं के आदेशों की खुलेआम अनदेखी की गई। अब अगर जरूरत पड़ी तो वे राज्यपाल को लिखित शिकायत भेजने के साथ सड़क पर उतरकर आंदोलन करने को भी तैयार हैं। राज्यपाल निवास के सामने धरना प्रदर्शन कर प्रशासन की बेरुखी के खिलाफ आवाज उठाई जाएगी।
प्रशासन की नाकामी पर जनता का आक्रोश
स्थानीय लोगों ने भी इस घटना को गरियाबंद प्रशासन के लिए “कलंक” बताया है। उनका कहना है कि करोड़ों की योजनाओं और शिक्षा पर खर्च के बावजूद अगर सुपेबेड़ा जैसी जगह की विधवाएँ इस तरह तड़पती रहें और राज्यपाल के आदेशों का भी मज़ाक बनाया जाए, तो यह पूरे शासन-प्रशासन की नाकामी का प्रमाण है।
अब यह सिर्फ नौकरी नहीं, सम्मान की लड़ाई
सुपेबेड़ा की पीड़ित महिलाओं की यह लड़ाई अब सिर्फ रोजगार की नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान की लड़ाई बन चुकी है — और यह लड़ाई अब सीधे राज्यपाल तक जाएगी।
Author: थनेश्वर बंजारे
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