मजदूरी सूची, मस्टर रोल और बिल-वाउचर की जानकारी मांगी गई थी; आवेदक बोले—सूचना रोकने से गड़बड़ी की जांच पर लग रहा विराम
थानेश्वर बंजारे
गरियाबंद /छुरा सरकारी योजनाओं और निर्माण कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाला सूचना का अधिकार अधिनियम यदि विभागीय जवाबों के बीच ही उलझ जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। वनमंडल गरियाबंद में आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी को न्यायालयीन प्रकरणों का हवाला देकर रोके जाने के आरोप ने विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला वन मार्ग निर्माण में मजदूरी भुगतान सूची, मस्टर रोल, बिल-वाउचर सहित ऐसे दस्तावेजों से जुड़ा है, जिनके आधार पर सरकारी राशि के उपयोग और भुगतान की वास्तविकता की जांच की जा सकती है। आवेदक प्रकाश कुमार यादव के अनुसार, आरटीआई के माध्यम से संबंधित दस्तावेज मांगे गए थे, लेकिन वनमंडलाधिकारी गरियाबंद मयंक पाण्डेय की ओर से WPC क्रमांक 3707/2023 सहित न्यायालयीन प्रकरणों का हवाला देते हुए जानकारी उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस न्यायालयीन प्रकरण का हवाला देकर सूचना रोकी जा रही है, क्या उसके आदेश में वास्तव में मांगी गई जानकारी सार्वजनिक करने पर स्पष्ट रोक है?
प्रकरण नंबर बता देना ही सूचना रोकने का आधार कैसे?
आरटीआई आवेदकों का कहना है कि यदि न्यायालय ने किसी विशेष दस्तावेज या सूचना के प्रकटीकरण पर रोक लगाई है तो उसका पालन किया जाना चाहिए, लेकिन केवल किसी WPC या WPS प्रकरण का नंबर बताकर उससे संबंधित सभी सूचनाओं को रोक देना सवालों के घेरे में है। विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित न्यायालयीन आदेश की कौन-सी शर्त आरटीआई में मांगी गई सूचना पर लागू होती है। सूचना देने से इनकार की स्थिति में वैधानिक आधार स्पष्ट होना जरूरी है। खासकर तब, जब मांगी गई जानकारी सरकारी राशि से हुए निर्माण कार्य, मजदूरी भुगतान और विभागीय अभिलेखों से संबंधित हो।
फर्जी नामों पर भुगतान हुआ तो सामने कैसे आएगा सच?
मामले को लेकर सबसे गंभीर सवाल वन मार्ग निर्माण की मजदूरी भुगतान सूची और मस्टर रोल से जुड़ा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि यदि कहीं फर्जी नाम दर्ज कर मजदूरी की राशि निकालने, फर्जी हाजिरी लगाने अथवा फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से भुगतान किए जाने जैसी अनियमितताएं हुई हैं, तो वास्तविक अभिलेखों की जांच के बिना सच्चाई सामने आना मुश्किल है। यही वजह है कि आरटीआई के माध्यम से मजदूरों की सूची, मस्टर रोल, भुगतान विवरण, बिल-वाउचर, कार्यादेश और संबंधित निर्माण कार्यों के दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन जानकारी ही उपलब्ध नहीं होगी तो शिकायतों की स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक निगरानी प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है।
चार वन परिक्षेत्रों की आरटीआई भी सवालों में
गरियाबंद वनमंडल के गरियाबंद, नवागढ़, मैनपुर और इंदागांव वन परिक्षेत्रों से संबंधित आरटीआई आवेदनों के निराकरण को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आवेदकों का आरोप है कि विभिन्न मामलों में न्यायालयीन प्रकरणों और कानूनी प्रावधानों का हवाला देकर जानकारी उपलब्ध कराने में टालमटोल की जा रही है।
यदि वास्तव में अलग-अलग मामलों में समान आधार पर सूचनाएं रोकी गई हैं, तो विभागीय स्तर पर इसकी समीक्षा कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन आरटीआई आवेदनों में कौन-सी सूचना मांगी गई थी और उसे रोकने के पीछे कौन-सा वैधानिक प्रावधान लागू किया गया।
प्रथम अपील के बाद भी नहीं मिली जानकारी तो जिम्मेदारी किसकी?
आवेदकों का कहना है कि कुछ मामलों में प्रथम अपील के बाद भी अपेक्षित जानकारी नहीं मिल सकी है। ऐसे में प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा दिए गए आदेश और उसमें दर्ज कारणों को भी सार्वजनिक जांच के दायरे में लाने की जरूरत है। आरटीआई कानून में सूचना देने से इनकार की स्थिति में कारण बताने और अपील का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। इसलिए किसी न्यायालयीन प्रकरण का हवाला देने के साथ यह बताना भी जरूरी है कि मांगी गई सूचना उस प्रकरण के किस हिस्से से प्रभावित होती है।
बिल-वाउचर से लेकर मजदूरी भुगतान तक हो जांच
मामले में अब मांग उठ रही है कि वन मार्ग निर्माण से जुड़े कार्यों का स्वतंत्र स्तर पर परीक्षण कराया जाए। मस्टर रोल में दर्ज मजदूरों का भौतिक सत्यापन, भुगतान सूची का बैंक रिकॉर्ड से मिलान, बिल-वाउचर की जांच, कार्यस्थल का निरीक्षण और माप पुस्तिका का परीक्षण कराया जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि सरकारी राशि का भुगतान वास्तविक कार्य और वास्तविक हितग्राहियों के नाम पर हुआ है या नहीं। यदि जांच में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता या फर्जी दस्तावेज सामने आते हैं तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो विभाग भी दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट कर सकता है।
अब विभाग से सीधे सवाल
वनमंडल गरियाबंद में किन-किन आरटीआई आवेदनों में WPC/WPS प्रकरणों का हवाला देकर जानकारी रोकी गई? संबंधित न्यायालयीन आदेश में वास्तव में क्या निर्देश हैं? क्या उन आदेशों में मांगी गई मजदूरी भुगतान सूची, मस्टर रोल और बिल-वाउचर सार्वजनिक करने पर स्पष्ट रोक है? प्रथम अपीलों में क्या निर्णय हुए? और जिन निर्माण कार्यों में भुगतान को लेकर शिकायतें हैं, उनकी जांच कब और किस स्तर पर हुई? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के आधार पर ही सामने आ सकता है।
उच्चस्तरीय जांच की मांग
आरटीआई आवेदक पक्ष ने वनमंडल गरियाबंद में सूचना रोकने से जुड़े मामलों की उच्चस्तरीय समीक्षा की मांग की है। मांग है कि न्यायालयीन प्रकरणों का हवाला देकर रोकी गई सूचनाओं की जांच हो, संबंधित आदेशों की वास्तविक प्रासंगिकता स्पष्ट की जाए तथा वन मार्ग निर्माण से जुड़े मजदूरी भुगतान, मस्टर रोल और बिल-वाउचर की निष्पक्ष जांच कराई जाए। अब देखना होगा कि वन विभाग इन सवालों का दस्तावेजी जवाब देता है या नहीं। क्योंकि यदि रिकॉर्ड में सब कुछ नियमानुसार है, तो जानकारी और दस्तावेज ही सबसे मजबूत जवाब हो सकते हैं; लेकिन सूचना रोकने की प्रक्रिया यदि पारदर्शी नहीं होगी, तो संदेह और सवाल दोनों बढ़ते रहेंगे।
Author: थनेश्वर बंजारे
Dist :- Gariyaband Phone No. :- 7067148964 Gmail :- Banjarethaneshwar544@gmail.com




