विधायक-मंत्री बदलते रहे, नहीं बदली डूमरडीह की सड़क की तस्वीर

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विधायक-मंत्री बदलते रहे, नहीं बदली डूमरडीह की सड़क की तस्वीर

छुरा ब्लॉक मुख्यालय से महज 5 किमी दूर 30-35 परिवार पक्की सड़क से वंचित, 25 साल से ग्रामीण कर रहे सड़क निर्माण का इंतजार

गरियाबंद /छुरा-: विकास की रफ्तार और सरकारी योजनाओं के तमाम दावों के बीच छुरा विकासखंड का एक गांव आज भी ऐसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है, जिसे ग्रामीण विकास की पहली सीढ़ी मानते हैं। ग्राम पंचायत सारागांव के आश्रित ग्राम डूमरडीह में करीब 30 से 35 परिवार रहते हैं, लेकिन इन ग्रामीणों के लिए गांव तक पहुंचने वाली पक्की सड़क आज भी सपना बनी हुई है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि डूमरडीह ब्लॉक मुख्यालय छुरा से महज करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके बावजूद गांव को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग वर्षों से कच्चा है।

ग्रामीणों का कहना है कि करीब 25 वर्षों से वे पक्की सड़क की मांग कर रहे हैं। इस दौरान पंचायत में कई सरपंच आए और चले गए, क्षेत्र में जनप्रतिनिधि बदले, सरकारें बदलीं और विकास के अनेक दावे हुए, लेकिन डूमरडीह की सड़क की स्थिति में कोई स्थायी बदलाव नहीं आया। हर साल बारिश से पहले सड़क पर मुरुम डालकर अस्थायी मरम्मत कर दी जाती है, लेकिन बरसात आते ही मुरुम बह जाता है और सड़क फिर कीचड़, गड्ढों तथा फिसलन में बदल जाती है।

बरसात आते ही गांव की राह बन जाती है मुश्किल

सामान्य दिनों में किसी तरह आवाजाही कर लेने वाले ग्रामीणों के लिए बरसात का मौसम सबसे बड़ी परेशानी लेकर आता है। बारिश के बाद कच्चे मार्ग पर कीचड़ और फिसलन इतनी बढ़ जाती है कि दोपहिया वाहनों से गुजरना भी जोखिम भरा हो जाता है। कई स्थानों पर सड़क पर बने गड्ढों और कीचड़ के कारण वाहन फिसलने की स्थिति बनी रहती है। ग्रामीणों के मुताबिक, इस मार्ग से गुजरते समय कई लोग गिरकर चोटिल भी हो चुके हैं।

सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं, स्कूली बच्चों और मरीजों को होती है। किसी व्यक्ति को इलाज के लिए छुरा ले जाना हो या ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए ब्लॉक मुख्यालय पहुंचना हो, उन्हें इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। बारिश के दौरान सड़क की खराब स्थिति के कारण कई बार लोगों को अतिरिक्त समय और जोखिम दोनों उठाना पड़ता है।

मुरुम डालने से नहीं होगा स्थायी समाधान

ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बरसात से पहले पंचायत द्वारा सड़क पर मुरुम डलवाया जाता है। इससे कुछ दिनों के लिए सड़क चलने लायक जरूर हो जाती है, लेकिन पहली तेज बारिश के बाद मुरुम बह जाता है और सड़क पहले जैसी बदहाल हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि जब लंबे समय से इसी मार्ग पर ग्रामीणों की आवाजाही है तो बार-बार अस्थायी मरम्मत करने के बजाय स्थायी रूप से पक्की सड़क का निर्माण क्यों नहीं कराया जाता?

ग्रामीणों के अनुसार, मुरुम डालने में हर साल खर्च होने वाली राशि का यदि उचित तरीके से उपयोग करते हुए एक बार सड़क का पक्कीकरण कर दिया जाए तो समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।

25 साल में बदले कई चेहरे, नहीं बदली सड़क

डूमरडीह के ग्रामीणों की सबसे बड़ी नाराजगी इस बात को लेकर है कि सड़क निर्माण की मांग कोई नई मांग नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक, लगभग ढाई दशक से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है। इस दौरान कई बार पंचायत प्रतिनिधियों और संबंधित जिम्मेदारों के सामने समस्या रखी गई। ग्रामीणों का कहना है कि आश्वासन मिलते रहे, लेकिन जमीन पर सड़क नहीं बन पाई।

ग्रामीणों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जब ब्लॉक मुख्यालय से गांव की दूरी महज करीब 5 किलोमीटर है तो इतनी कम दूरी के मार्ग का पक्कीकरण आखिर इतने वर्षों में क्यों नहीं हो सका? क्या यह मार्ग किसी बड़ी योजना में शामिल नहीं हो सकता? क्या संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधियों तक ग्रामीणों की मांग नहीं पहुंची या फिर पहुंचने के बाद भी इसे गंभीरता से नहीं लिया गया?

विकास के दावों के बीच ग्रामीण पूछ रहे सवाल

सरकारें गांव-गांव तक सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की बात करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क को विकास की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में माना जाता है, क्योंकि सड़क से ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बाजार और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच आसान होती है। ऐसे में ब्लॉक मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर दूर स्थित डूमरडीह के ग्रामीणों का वर्षों से पक्की सड़क के लिए इंतजार करना कई सवाल खड़े करता है।

ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में विधायक और मंत्री बदलते रहे, जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल आते-जाते रहे, लेकिन डूमरडीह की सड़क की तस्वीर नहीं बदली। गांव के लोगों को आज भी बारिश में उसी कीचड़ और फिसलन से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे वे वर्षों से परेशान हैं।

मरीजों और स्कूली बच्चों के लिए सबसे बड़ी परेशानी

सड़क की बदहाली का सीधा असर गांव के बच्चों और मरीजों पर पड़ता है। बरसात में सड़क खराब होने के कारण बच्चों को स्कूल आने-जाने में परेशानी होती है। वहीं किसी ग्रामीण के अचानक बीमार पड़ने या आपात स्थिति में अस्पताल ले जाने की जरूरत होने पर खराब सड़क चिंता का कारण बन जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क बेहतर होने से गांव के लोगों को छुरा पहुंचने में काफी सुविधा होगी और रोजमर्रा की आवश्यकताओं के लिए भी उन्हें परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी।

ग्रामीणों ने की स्थायी सड़क निर्माण की मांग

डूमरडीह के ग्रामीणों ने प्रशासन, संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि गांव तक पहुंचने वाले मुख्य मार्ग का स्थल निरीक्षण कराकर पक्की सड़क निर्माण के लिए प्रस्ताव तैयार किया जाए और जल्द से जल्द काम शुरू कराया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें हर साल बारिश से पहले मुरुम डलने और बारिश के बाद सड़क खराब होने के चक्र से बाहर निकालने की जरूरत है।

करीब 25 वर्षों से सड़क की बाट जोह रहे डूमरडीह के ग्रामीण अब आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर पक्की सड़क देखना चाहते हैं। ब्लॉक मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर दूर बसे इस गांव की सड़क कब पक्की होगी और ग्रामीणों का वर्षों पुराना इंतजार कब खत्म होगा, यह अब जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल है।

थनेश्वर बंजारे
Author: थनेश्वर बंजारे

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