महासमुंद बोनस घोटाला: किसानों की मेहनत का शोषण, ट्रस्टों के नाम पर करोड़ों का काला खेल – कलेक्टर के आदेश पर भी जांच ठप्प!

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महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में धान खरीदी के नाम पर चला आ रहे बोनस वितरण का सारा तंत्र भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। लहंगर उपार्जन केंद्र (पंजीयन क्रमांक 868) से जुड़े दस्तावेजों ने एक संगठित घोटाले का पर्दाफाश किया है, जहां मंदिर ट्रस्टों, समिति प्रभारियों, कंप्यूटर ऑपरेटरों और बैंक अधिकारियों की सांठगांठ से सरकारी बोनस राशि को फर्जी दस्तावेजों के जरिए व्यक्तिगत खातों में हस्तांतरित कर दिया गया। वर्ष 2023-24 की धान खरीदी में ही शासन को करीब 22 लाख रुपये की सीधी वित्तीय क्षति हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि पिछले 5 वर्षों की गहन जांच हो तो यह आंकड़ा करोड़ों में पहुंच सकता है।

 

सबसे दर्दनाक तथ्य यह है कि महासमुंद के कलेक्टर द्वारा जांच के लिए जारी आदेश को एक माह से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इसे ठंडे बस्ते में डालकर चुप्पी साधे हुए हैं। नियमों के मुताबिक, ऐसी शिकायतों पर 7 दिनों के अंदर जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपनी होती है, लेकिन यहां तो जांच का नामोनिशान नहीं। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक है, बल्कि भ्रष्टाचार की जड़ों को मजबूत करने जैसा भी लगता है। स्थानीय किसान और ग्रामीण इस घोटाले से आक्रोशित हैं, क्योंकि एक ओर वे अपनी फसल बेचने के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़े रहते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े लोग ट्रस्टों के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग कर रहे हैं।

घोटाले की जड़ें: लहंगर उपार्जन केंद्र का काला अध्याय

लहंगर उपार्जन केंद्र सिरपुर क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जो ऐतिहासिक और पर्यटन नगरी के रूप में जाना जाता है। लेकिन यहां 2023-24 की धान खरीदी के दौरान हुए अनियमितताओं ने इसकी छवि को धूमिल कर दिया। दस्तावेजों के अनुसार, कई ट्रस्टों और व्यक्तिगत नामों पर दर्ज भूमि के नाम पर बोनस राशि का भुगतान गलत खातों में कर दिया गया। यह सब फर्जी टोकन नंबरों, गलत खाता विवरणों और समिति प्रभारियों की मिलीभगत से संभव हुआ। आइए, कुछ प्रमुख मामलों पर नजर डालें:

गंधेश्वरनाथ श्री महादेव मंदिर सिरपुर (बसरा नं. 462, रकबा 8.2400 हेक्टेयर)

खरीदी राशि: 2,39,887.20 रुपये।

भुगतान: दाउलाल चंद्राकर के व्यक्तिगत खाते में।

अनियमितता: नियमों के अनुसार, मंदिर ट्रस्ट की भूमि पर प्राप्त बोनस राशि सीधे ट्रस्ट के आधिकारिक खाते में जमा होनी चाहिए थी। लेकिन यहां व्यक्तिगत खाते में ट्रांसफर कर शासन को ठगा गया। यह ट्रस्ट सिरपुर के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है, और इसका दुरुपयोग स्थानीय भक्तों के विश्वास को भी चोट पहुंचाता है।

बेनुरम बेलाल उर्फ लक्ष्मण खड़सा (खसरा नं. 110/5, रकबा 0.1700 हेक्टेयर)

खरीदी राशि: 2,61,697 रुपये।

भुगतान: सरस्वती/रमेश के खाते में।

अनियमितता: भूमि का मालिक स्वयं किसान था, लेकिन बोनस राशि किसी तीसरे पक्ष के खाते में डाल दी गई। यह स्पष्ट फर्जीवाड़ा है, जहां किसान की मेहनत का फल दूसरे को मिल गया। जांच में पता चला कि टोकन नंबरों के साथ छेड़छाड़ की गई थी।

 

कनक, डेहरा, फेहरा, कार्तिक और अन्य (खसरा नं. 224, 537, 541 आदि)

खरीदी राशि: 1,62,309 रुपये।

भुगतान: हेमंत चंद्राकर दौलत के खाते में।

अनियमितता: भूमि स्वामी अलग व्यक्ति थे, लेकिन भुगतान पूरी तरह से किसी और के नाम पर। यह मामला समिति प्रभारी की भूमिका पर सवाल उठाता है, क्योंकि वे ही टोकन जारी करने वाले होते हैं।

प्रभु गढ़सिवनी (खसरा नं. 2778/2, 3552/2, 4220, 4295/2, 4296)

खरीदी राशि: 59,605 रुपये।

भुगतान: नवीन कुमार/दौलत के खाते में।

अनियमितता: यहां भी नियमों का खुला उल्लंघन हुआ। भूमि रिकॉर्ड में स्पष्ट उल्लेख के बावजूद राशि गलत खाते में ट्रांसफर की गई, जो बैंक प्रबंधक की लापरवाही या मिलीभगत को इंगित करता है।

गंधेश्वरनाथ मंदिर ट्रस्ट (खसरा नं. 195, 199, 225 आदि, रकबा 27.57 हेक्टेयर)

भुगतान: 10,00,000 रुपये।

लाभार्थी: तोषण कुमार सेन/खोर बहराराम सेन।

अनियमितता: ट्रस्ट की कुल भूमि पर बोनस का दावा किया गया, लेकिन रिकॉर्ड में केवल 0.22 हेक्टेयर दर्ज था। बाकी राशि व्यक्तिगत खातों में हड़प ली गई। यह ट्रस्ट के पदाधिकारियों की साजिश का नमूना है।

राधाकृष्णा मंदिर सिरपुर (खसरा नं. 103, 137, 139 आदि, रकबा 9.1900 हेक्टेयर)

खरीदी राशि: 4,31,723.60 रुपये।

भुगतान: रामेश्वर वैष्णव पिता माधो दास के खाते में।

अनियमितता: मंदिर ट्रस्ट की भूमि होने के बावजूद राशि व्यक्तिगत खाते में डाली गई। यह धार्मिक संस्था के नाम पर सरकारी धन के दुरुपयोग का जीता-जागता उदाहरण है।

ये केवल कुछ उदाहरण हैं। कुल मिलाकर, इन अनियमितताओं से शासन को 22 लाख रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन शिकायतकर्ता का दावा है कि यह आंकड़ा सिर्फ टिप ऑफ द आइसबर्ग है। यदि 2019-20 से 2023-24 तक के सभी टोकन नंबरों और भुगतान रिकॉर्ड की जांच हो, तो करोड़ों का घोटाला सामने आ सकता है।

नियमों का खुला उल्लंघन: ट्रस्ट और संस्थाएं बोनस के दायरे से बाहर

छत्तीसगढ़ सरकार के नियमों के अनुसार, बोनस वितरण का लाभ केवल व्यक्तिगत किसानों को मिलना चाहिए। ट्रस्ट, स्कूल विकास समितियां, निजी संस्थाएं या सरकारी महाविद्यालय जैसी इकाइयां इस योजना से बाहर हैं। लेकिन लहंगर केंद्र में कंप्यूटर ऑपरेटरों ने फर्जी एंट्रीज डालकर ट्रस्टों की भूमि को किसानों के नाम पर पंजीकृत कर दिया। इसके बाद बैंक अधिकारियों ने बिना सत्यापन के राशि ट्रांसफर कर दी। यह सारी प्रक्रिया IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध की श्रेणी में आती है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि सरकारी तंत्र के विश्वासघात का मामला भी है, जिसके लिए दोषियों को कड़ी सजा होनी चाहिए।

कलेक्टर का आदेश: क्यों हो रही अनदेखी?

शिकायत महासमुंद कलेक्टर और संभागीय उपायुक्त के पास पहुंची, जिसके बाद कलेक्टर ने जांच के आदेश जारी किए। लेकिन एक माह बाद भी कोई प्रगति नहीं। सवाल उठ रहे हैं:

क्या जांच अधिकारी दबाव में हैं?

क्या राजनीतिक संरक्षण इस घोटाले को बचा रहा है?

क्या बड़े नामों को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जाएगा?

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि समिति प्रभारी और बैंक मैनेजर जैसे छोटे अधिकारी तो सामने आ सकते हैं, लेकिन ट्रस्ट पदाधिकारियों और उच्च अधिकारियों की भूमिका पर पर्दा डाला जा रहा है। छत्तीसगढ़ में हाल ही में सुकमा के तेंदूपत्ता बोनस घोटाले में EOW ने 11 अधिकारियों को गिरफ्तार किया था, जहां करोड़ों का गबन हुआ था। उसी तरह यहां भी केंद्रीय जांच एजेंसी की जरूरत महसूस हो रही है।

शिकायत की मांगें: विशेष टीम और वसूली पर जोर

शिकायत पत्र में स्पष्ट मांगें की गई हैं:

जिला स्तर पर विशेष जांच टीम का गठन, जिसमें उपायुक्त (सहकारिता), DMO (मार्फेड), राजस्व अधिकारी और नोडल अधिकारी शामिल हों।

पिछले 5 वर्षों के सभी बोनस भुगतान और टोकन नंबरों की विस्तृत जांच।

संदिग्ध खातों की सूची तैयार कर राशि की वसूली।

दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई।

शिकायतकर्ता ने कहा, “यह घोटाला किसानों की कमर तोड़ रहा है। हमारी मेहनत का बोनस बड़े लोग हड़प रहे हैं, जबकि हमें महीनों इंतजार करना पड़ता है।”

सिरपुर में जनाक्रोश: पर्यटन नगरी का कलंक

सिरपुर, जो बौद्ध और हिंदू धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, अब भ्रष्टाचार की चर्चा का केंद्र बन गया है। लहंगर और आसपास के गांवों में किसान कहते हैं, “हम टोकन कटवाने के लिए रात-दिन चक्कर लगाते हैं, लेकिन ट्रस्ट वाले लाखों रुपये ले उड़ते हैं।” ग्रामीणों का आरोप है कि यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है, और स्थानीय अधिकारी आंखें बंद किए हुए हैं। यदि जांच नहीं हुई, तो यह विश्वास संकट और गहरा जाएगा।

आगे की राह: ईमानदार जांच से करोड़ों की बचत संभव

यदि इस मामले पर सख्ती की जाती है, तो:

22 लाख रुपये का नुकसान तो रिकवर हो ही जाएगा।

पिछले वर्षों के रिकॉर्ड से करोड़ों का गबन उजागर हो सकता है।

दोषी अधिकारियों, ट्रस्ट पदाधिकारियों और बैंक कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी, जो अन्य घोटालों के लिए नजीर बनेगी।

लेकिन यदि टालमटोल जारी रही, तो यह मामला भी प्रदेश के अन्य भ्रष्टाचार कांडों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा। महासमुंद जिला, जो कृषि-प्रधान है, यहां के किसानों की उम्मीदें प्रशासन पर टिकी हैं। कलेक्टर और संभागीय उपायुक्त अब क्या कदम उठाते हैं, यह तय करेगा कि शासन का विश्वास बहाल होता है या नहीं। जनता की नजरें प्रशासन पर हैं – जांच जारी है या ठंडे बस्ते में? समय जवाब मांगेगा।

थनेश्वर बंजारे
Author: थनेश्वर बंजारे

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