धनेन्द्र साहू ने कलेक्टर से की निष्पक्ष जांच की मांग; शिकायत पर जांच अधिकारी तहसीलदार के कथित जवाब—‘परमिशन लिया है, इसमें जांच वाली क्या बात है?’—से उठे सवाल, आंदोलन और हाईकोर्ट जाने की चेतावनी
थानेश्वर बंजारे
गोबरा नवापारा/रायपुर। देशभर में पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान चलाया जा रहा है, वहीं ग्राम पारागांव स्थित हनुमान एग्रो परिसर में दशकों पुराने नीलगिरी के पेड़ों की कटाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल यह है कि जब एक-एक पेड़ लगाने के लिए लोगों को प्रेरित किया जा रहा है, तो फिर सैकड़ों और हजारों पेड़ आखिर किसके नाम पर काटे जा रहे हैं? क्या सरकारी जमीन पर लगे पेड़ों की कटाई केवल अनुमति का हवाला देकर उचित ठहराई जा सकती है? और यदि शिकायत के बाद भी जांच के बजाय अनुमति का तर्क दिया जा रहा है, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
ग्राम पारागांव में हनुमान एग्रो परिसर में पेड़ों की कटाई का मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री धनेन्द्र साहू ने रायपुर कलेक्टर को पत्र लिखकर मामले की निष्पक्ष जांच कराने, शेष पेड़ों की कटाई रुकवाने, काटे गए पेड़ों की बिक्री का हिसाब सामने लाने और दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। वहीं, शिकायतकर्ता के अनुसार, जांच अधिकारी तहसीलदार द्वारा दिया गया कथित जवाब अब मामले में नए सवाल खड़े कर रहा है।
सरकारी जमीन, दशकों पुराने पेड़ और कटाई पर विवाद
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पारागांव में मेसर्स हनुमान एग्रो प्राइवेट लिमिटेड द्वारा कई दशक पहले धान के पैरा से पुट्ठा एवं गद्दे बनाने की फैक्ट्री स्थापित की गई थी। फैक्ट्री के लिए कंपनी की निजी भूमि के अतिरिक्त आसपास की शासकीय भूमि को भी लीज पर दिए जाने की जानकारी सामने आई है। धनेन्द्र साहू के पत्र में विभिन्न खसरों का विवरण देते हुए लगभग 24 एकड़ 31 डिसमिल शासकीय भूमि का उल्लेख किया गया है।
बताया जाता है कि संबंधित भूमि पर फैक्ट्री प्रबंधन द्वारा बड़ी संख्या में नीलगिरी के पेड़ लगाए गए थे। ये वृक्ष कथित तौर पर 30 से 40 वर्ष या उससे अधिक पुराने हैं। फैक्ट्री का उत्पादन बंद होने और परिसर को किसी अन्य व्यक्ति अथवा कंपनी को बेचे जाने की जानकारी के बाद पेड़ों की कटाई का मामला सामने आया।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पेड़ों की कटाई के साथ पोकलेन मशीनों से ठूंठ उखाड़कर जमीन का समतलीकरण भी किया जा रहा है। यदि ऐसा हो रहा है, तो सवाल केवल पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी भूमि के उपयोग, लीज की शर्तों और पर्यावरणीय नुकसान की जांच भी जरूरी हो जाती है।
75 सागौन और 700 नीलगिरी की अनुमति, फिर दूसरी प्रजातियों के पेड़ कैसे कटे?
मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार, संबंधित परिसर में 75 सागौन और 700 नीलगिरी के पेड़ों की कटाई की अनुमति लिए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, शिकायतकर्ता का आरोप है कि अनुमति में उल्लेखित प्रजातियों के अलावा अन्य प्रजातियों के पेड़ों की भी कटाई की गई है। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
यदि अनुमति वास्तव में निर्धारित संख्या और प्रजातियों के पेड़ों के लिए जारी की गई थी, तो प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि मौके पर कुल कितने पेड़ काटे गए, उनमें कौन-कौन सी प्रजातियां शामिल थीं और क्या कटाई अनुमति की सभी शर्तों के अनुरूप हुई? क्या अनुमति निजी भूमि के पेड़ों के लिए थी या उसमें शासकीय लीज भूमि पर लगे वृक्ष भी शामिल थे? क्या कटाई से पहले राजस्व, वन और अन्य संबंधित विभागों के अभिलेखों का सत्यापन किया गया था?
इन सवालों का जवाब केवल अनुमति पत्र दिखाने से नहीं मिलेगा। इसके लिए अनुमति की मूल प्रति, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट, पेड़ों की प्रजातिवार गणना, कटाई के बाद की स्थिति और भूमि के स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों की जांच जरूरी है।
‘परमिशन लिया है, इसमें जांच वाली क्या बात है?’—तहसीलदार के कथित जवाब पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर सवाल जांच अधिकारी तहसीलदार की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जब ग्राम पारागांव में पेड़ों की कटाई को लेकर शिकायत की गई और जांच की मांग उठाई गई, तब संबंधित जांच अधिकारी तहसीलदार ने कथित तौर पर कहा—‘परमिशन लिया है, इसमें जांच वाली क्या बात है?’
यदि शिकायतकर्ता द्वारा बताया गया यह जवाब सही है, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर किसी मामले में अनुमति मिल जाने मात्र से क्या उसके नियमों और शर्तों के पालन की जांच जरूरी नहीं रह जाती? जब शिकायत में अनुमति से अधिक या अन्य प्रजातियों के पेड़ों की कटाई और शासकीय भूमि पर लगे पुराने वृक्षों को काटे जाने के आरोप हैं, तो इन तथ्यों की जांच करना संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी नहीं है क्या?
अनुमति जांच का विकल्प नहीं, बल्कि जांच का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। अनुमति जारी हुई है तो उसकी वैधता, दायरा, शर्तें और मौके पर हुए काम का मिलान भी होना चाहिए। यदि किसी शिकायत को केवल अनुमति का हवाला देकर नजरअंदाज कर दिया जाए, तो फिर नियमों के उल्लंघन की आशंका की जांच कौन करेगा?
जांच अधिकारी तहसीलदार को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या मौके का निरीक्षण किया गया? क्या अनुमति पत्र में दर्ज पेड़ों की संख्या और प्रजातियों का कटे हुए वृक्षों से मिलान किया गया? क्या सरकारी जमीन पर लगे पेड़ों के स्वामित्व और लकड़ी की बिक्री के रिकॉर्ड की जांच की गई? यदि जांच हुई है, तो उसकी रिपोर्ट क्या कहती है? और यदि जांच नहीं हुई, तो शिकायत में उठाए गए गंभीर सवालों की अनदेखी क्यों की गई?
शिकायतकर्ता ने कथित जवाब पर नाराजगी जताते हुए सवाल उठाया है कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल अनुमति का हवाला देना नहीं, बल्कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना भी है। हालांकि, संबंधित तहसीलदार का पक्ष और कथित बयान की स्वतंत्र पुष्टि सामने आना भी जरूरी है।
‘एक पेड़ मां के नाम’ का संदेश और जमीन पर हजारों पेड़ों की कटाई!
पर्यावरण संरक्षण आज सरकार, प्रशासन और समाज—सभी की प्राथमिकता का विषय है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक ओर पौधरोपण अभियान चलाकर लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर दशकों में तैयार हुए वृक्षों की कटाई के मामले में क्या पर्याप्त सावधानी बरती गई?
यदि सैकड़ों या हजारों पेड़ काटे गए हैं, तो उनकी वास्तविक संख्या, प्रजाति, अनुमानित बाजार मूल्य और बिक्री से प्राप्त राशि का हिसाब सामने आना चाहिए। धनेन्द्र साहू ने भी पेड़ों के मूल्य और बिक्री की जांच की मांग की है। हालांकि, पेड़ों की वास्तविक संख्या और उनके बाजार मूल्य का अंतिम आकलन आधिकारिक गणना एवं दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही किया जा सकता है।
प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि शासकीय भूमि जिस उद्देश्य से लीज पर दी गई थी, क्या उसका वर्तमान उपयोग लीज की शर्तों के अनुरूप है? यदि जमीन या फैक्ट्री का हस्तांतरण हुआ है, तो क्या उसके लिए आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया?
ठूंठ उखाड़ने से साक्ष्य मिटने की आशंका, पहले संरक्षण फिर जांच
धनेन्द्र साहू ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि मौके पर कटे हुए पेड़ और उनके ठूंठ दिखाई दे रहे हैं। शिकायत के अनुसार, मशीनों से ठूंठ उखाड़कर भूमि का समतलीकरण किए जाने की आशंका भी है। यदि यह कार्य जारी है, तो पेड़ों की वास्तविक संख्या और कटाई की स्थिति का आकलन कठिन हो सकता है।
ऐसे में प्रशासन को तत्काल स्थल निरीक्षण कर शेष पेड़ों, कटे वृक्षों, ठूंठों, लकड़ी के भंडारण तथा परिवहन और बिक्री से संबंधित दस्तावेजों का रिकॉर्ड तैयार करना चाहिए। आवश्यक होने पर नियमानुसार रोक लगाकर साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए, ताकि जांच केवल कागजों तक सीमित न रहे।
धनेन्द्र साहू ने बताया है कि उन्होंने 16 अक्टूबर 2026 को शाम लगभग छह बजे अभनपुर के एसडीएम को भी मामले की सूचना दी थी। हालांकि, उस सूचना पर अब तक क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। इस बिंदु पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
कंपनी और जिम्मेदार विभागों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी
इस पूरे प्रकरण में राजस्व विभाग, वन विभाग और अनुमति जारी करने वाले संबंधित अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में होनी चाहिए। यदि अनुमति के अनुसार ही कटाई हुई है, तो प्रशासन दस्तावेजों और स्थल निरीक्षण के आधार पर स्थिति स्पष्ट करे। यदि अनुमति से अधिक पेड़ काटे गए हैं या शासकीय भूमि पर लगे वृक्षों की कटाई में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
शिकायतकर्ता पक्ष ने कंपनी और संबंधित अधिकारियों के बीच संभावित मिलीभगत की आशंका भी जताई है। हालांकि, यह आरोप अभी प्रमाणित नहीं है। इसकी सच्चाई निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकती है। प्रशासन को चाहिए कि वह किसी भी पक्ष को पहले से दोषी या निर्दोष मानने के बजाय तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय ले।
अब आंदोलन और हाईकोर्ट जाने की चेतावनी
शिकायतकर्ता पक्ष ने संकेत दिया है कि यदि निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो नई रणनीति के तहत आंदोलन किया जाएगा और न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा। ऐसे में यह प्रकरण आने वाले दिनों में प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर और गंभीर रूप ले सकता है।
कलेक्टर से उठीं प्रमुख मांगें
धनेन्द्र साहू ने रायपुर कलेक्टर से संबंधित राजस्व अभिलेखों, शासकीय भूमि की लीज, पेड़ों के स्वामित्व और कटाई की अनुमति की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने शेष पेड़ों की कटाई और ठूंठ उखाड़ने पर रोक लगाने, कटे हुए वृक्षों की प्रजातिवार गणना कराने, लकड़ी की बिक्री और प्राप्त राशि का हिसाब जांचने तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या पारागांव में पेड़ों की कटाई के मामले में अनुमति की शर्तों और सरकारी जमीन के अधिकारों की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर मामला अनुमति का हवाला देकर फाइलों में सिमट जाएगा? प्रशासन की कार्रवाई ही तय करेगी कि पर्यावरण संरक्षण, सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और जवाबदेही के दावों को जमीन पर कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है।
Author: थनेश्वर बंजारे
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