इलाज के नाम पर ‘रेफर एक्सप्रेस’! बुखार से जूझते डिगने की रास्ते में मौत, अमलीपदर के निजी क्लीनिक पर गंभीर सवाल
चार डोज के बाद बिगड़ी हालत, सरकारी अस्पताल से देवभोग और फिर ओडिशा रेफर… अस्पतालों की चौखट नापते-नापते थम गई ग्रामीण की सांसें
गरियाबंद।मैनपुर ब्लॉक के इंदागांव थाना क्षेत्र के ग्राम सराईपानी निवासी डिगने यादव की मौत ने इलाके की स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। बुखार जैसी सामान्य बीमारी के इलाज के लिए निकले डिगने को पहले अमलीपदर के एक निजी क्लीनिक ले जाया गया। इसके बाद उनकी हालत बिगड़ती गई और उन्हें एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया जाता रहा। आखिरकार धर्मगढ़ पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई।
यह सिर्फ एक मरीज की मौत नहीं, बल्कि यह सवाल है कि ग्रामीण अंचल में मरीज का इलाज हो रहा है या उसे सिर्फ एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजने की व्यवस्था चल रही है?
निजी क्लीनिक में आखिर कौन-सा इलाज हुआ?
परिजनों के मुताबिक डिगने यादव को बुखार था और उन्हें अमलीपदर के निजी क्लीनिक में इलाज के लिए ले जाया गया। आरोप है कि वहां उन्हें आर्टीसुनेट इंजेक्शन समेत अन्य दवाएं दी गईं। परिजनों का दावा है कि लगातार चार डोज दिए जाने के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ, बल्कि स्थिति बिगड़ती चली गई।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या मरीज की बीमारी की पुख्ता जांच के बाद उपचार किया गया था?
अगर जांच हुई थी तो उसकी रिपोर्ट क्या थी?
और अगर जांच नहीं हुई थी, तो किस आधार पर इतनी गंभीर दवाएं और इंजेक्शन दिए गए?
इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग की जांच से ही सामने आ सकता है।
जब हालत बिगड़ी, तब याद आया सरकारी अस्पताल!
हालत गंभीर होने के बाद डिगने को अमलीपदर के सरकारी अस्पताल लाया गया। वहां से उन्हें तत्काल देवभोग रेफर किया गया। इसके बाद देवभोग से ओडिशा के धर्मगढ़ अस्पताल ले जाने की कोशिश हुई।
यानी एक मरीज अमलीपदर → देवभोग → धर्मगढ़ की ‘रेफर एक्सप्रेस’ में जिंदगी की जंग लड़ता रहा।
लेकिन अस्पतालों के बीच दौड़ते-दौड़ते इलाज का समय निकल गया और धर्मगढ़ पहुंचने से पहले ही डिगने यादव की सांसें थम गईं।
त्योहार के दिन स्वास्थ्य व्यवस्था की ‘परीक्षा’ भी सवालों में
परिजनों के अनुसार जन्माष्टमी के दिन देवभोग अस्पताल में डॉक्टरों की उपलब्धता और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को लेकर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा।
अगर यह आरोप सही है तो सवाल बेहद गंभीर है—
क्या त्योहार के दिन भी आपातकालीन मरीजों के लिए पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई थी?
सरकारी अस्पतालों में आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था किसकी जिम्मेदारी है? और गंभीर मरीज को समय पर विशेषज्ञ उपचार क्यों नहीं मिल पाया?
परिजनों के सवालों से घिरा पूरा सिस्टम
निजी क्लीनिक ने मरीज की गंभीर होती हालत को देखते हुए शुरुआत में ही बड़े अस्पताल क्यों नहीं भेजा?
क्या इलाज से पहले बीमारी की पुख्ता जांच और डायग्नोसिस किया गया था?
आर्टीसुनेट सहित दी गई दवाओं की जरूरत और मात्रा क्या थी?
मरीज की हालत बिगड़ने के बाद रेफर करने में देरी तो नहीं हुई?
सरकारी अस्पताल में गंभीर मरीज के लिए तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सा क्यों उपलब्ध नहीं हो सकी?
अगर इलाज में कहीं लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
अब जांच ही बताएगी—इलाज था या लापरवाही?
मामले में निजी क्लीनिक की उपचार पर्ची, मरीज को दी गई दवाओं का रिकॉर्ड, इंजेक्शन का विवरण और सरकारी अस्पतालों के मेडिकल रिकॉर्ड की जांच बेहद जरूरी है।
डिगने यादव अब वापस नहीं आएंगे। लेकिन उनकी मौत से उठे सवालों का जवाब मिलना जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग यदि निष्पक्ष जांच करता है तो यह साफ हो सकता है कि आखिर एक सामान्य बुखार से शुरू हुई बीमारी में मरीज की हालत इतनी गंभीर कैसे हुई और इलाज की प्रक्रिया में कहां चूक हुई।
सवाल सिर्फ डिगने यादव की मौत का नहीं है—सवाल यह है कि ग्रामीण मरीजों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था आखिर इलाज का सहारा है या ‘रेफर एक्सप्रेस’ का टिकट काउंटर?
Author: थनेश्वर बंजारे
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