समाधान या फिर नई मुसीबत अधूरे पुल को लेकर जागा प्रशासन, लेकिन खतरा हुआ और बढ़ा

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समाधान या फिर नई मुसीबतअधूरे पुल को लेकर जागा प्रशासन, लेकिन खतरा हुआ और बढ़ा

सिंगल सीढ़ी के बाद अब सेंट्रिंग प्लेट से बना ‘मौत का रास्ता’, बच्चों और ग्रामीणों की जान जोखिम में

खबर के बाद अफसर पहुंचे, ठेकेदार को दिसंबर तक पुल पूरा करने का अल्टीमेटम; सवाल—अस्थाई व्यवस्था के नाम पर बढ़ाया गया खतरा कौन देखेगा?

गरियाबंद/मैनपुर-:तहसील मुख्यालय मैनपुर से महज 5 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत देहारगुड़ा और खामभाठा के बीच पैरी नदी पर पिछले 4-5 वर्षों से करोड़ों रुपये की लागत से बन रहा पुल अब विकास की बजाय ग्रामीणों के लिए खतरे का पर्याय बनता जा रहा है। पुल निर्माण की धीमी रफ्तार और बारिश के दौरान नदी में बढ़ते जलस्तर के बीच ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को अधूरे पुल से जान जोखिम में डालकर आवाजाही करनी पड़ रही है।

इस मामले को लेकर खबर प्रकाशित होने के करीब छह दिन बाद संबंधित विभाग के अधिकारी निर्माण स्थल पर पहुंचे और ग्रामीणों से चर्चा की। अधिकारियों ने ठेकेदार को दिसंबर 2026 तक पुल निर्माण पूरा करने का सख्त निर्देश दिया। लेकिन अधिकारियों के लौटते ही अस्थाई आवागमन की ऐसी व्यवस्था सामने आई है, जिसने राहत देने के बजाय खतरे को और बढ़ा दिया है।

सिंगल सीढ़ी से निकले तो अब सेंट्रिंग प्लेट की ‘हिलती सीढ़ी’

पहले ग्रामीण और स्कूली बच्चे करीब 20 फीट लंबी लोहे की पतली सीढ़ी के सहारे अधूरे पुल पर चढ़ते थे। पुल के दोनों ओर करीब 20 फीट गहरे हिस्से को पार करने के लिए लकड़ी और गत्तों का सहारा लेना पड़ रहा था। अब विभागीय निर्देश के बाद ठेकेदार के कर्मचारियों ने सेंट्रिंग प्लेटों को आपस में जोड़कर अस्थाई सीढ़ी तैयार कर दी है।

बताया जा रहा है कि यह सीढ़ी स्थिर नहीं है और हिलती-डुलती रहती है। हालात यह हैं कि बच्चे एक साथ चलने के बजाय बैठ-बैठकर इसे पार करने को मजबूर हैं। ऐसे में यदि किसी बच्चे या ग्रामीण का पैर फिसल गया तो नीचे गिरने से गंभीर हादसा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रशासन के सामने बड़ा सवाल—राहत या नई मुसीबत?

ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से पुल अधूरा पड़ा है और बारिश के दिनों में नदी उफान पर आ जाती है। ऐसे समय में सुरक्षित वैकल्पिक रास्ते की व्यवस्था किए बिना लोगों को अधूरे निर्माण स्थल से गुजरने देना बेहद जोखिम भरा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभागीय अधिकारी स्वयं स्थल का निरीक्षण कर चुके हैं और अस्थाई आवागमन की व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए हैं, तो क्या ऐसी हिलती-डुलती सीढ़ी को सुरक्षित व्यवस्था माना जा सकता है? यदि यहां कोई बड़ा हादसा होता है तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?

निर्माण स्थल पर सूचना पटल तक नहीं

ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया है कि करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे इस पुल के निर्माण स्थल पर अब तक निर्माण संबंधी आवश्यक सूचना पटल दिखाई नहीं देता। इससे आम लोगों को यह जानकारी भी नहीं मिल पा रही है कि पुल की स्वीकृत लागत कितनी है, निर्माण एजेंसी कौन है, कार्य की समय-सीमा क्या है और निर्माण कार्य कब तक पूरा होना था।

क्या कहते हैं अफसर

लोक निर्माण विभाग सेतु संभाग के ब्रिज एसडीओ एस.के. पंडोले ने बताया कि बड़े अधिकारियों द्वारा ठेकेदार को सख्त हिदायत दी गई है कि दिसंबर तक पुल का निर्माण पूरा किया जाए। ठेकेदार दो दिन पहले ही कार्यस्थल पर पहुंच चुका है और अस्थाई सीढ़ी बनाकर लोगों को आवागमन में सुविधा देने के निर्देश दिए गए हैं।

विधायक जनक ध्रुव ने जताई नाराजगी

बिंद्रानवागढ़ विधायक जनक ध्रुव ने मामले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पूरा मामला सामने आने के बाद भी सरकार सोई हुई है और किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्र के लोगों की समस्याओं की चिंता किसी को नहीं है। ग्रामीण किस तरह जान जोखिम में डालकर आवागमन कर रहे हैं, इससे शासन-प्रशासन को कोई लेना-देना नहीं है।

सरपंच बोले—जरूरत पड़ी तो आंदोलन करेंगे

ग्राम पंचायत सरपंच महेश दीवान, पूर्व सरपंच डिगेश्वरी सांडे, पवन दीवान, सोहन नागेश सहित ग्रामीणों ने कहा कि अधूरे पुल के कारण बच्चों और ग्रामीणों की जान लगातार खतरे में है। कई वर्षों से पुल निर्माण पूरा नहीं हो पाया है। अब अस्थाई रास्ते के नाम पर सेंट्रिंग प्लेट की हिलती सीढ़ी बना दी गई है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था और पुल निर्माण में तेजी नहीं लाई गई तो उन्हें आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

अब सवाल सिर्फ पुल कब बनेगा, यह नहीं है। असली सवाल यह है कि दिसंबर तक पुल पूरा होने के इंतजार में ग्रामीण और स्कूली बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? क्या प्रशासन किसी हादसे के बाद जागेगा या उससे पहले सुरक्षित रास्ते की व्यवस्था करेगा?

थनेश्वर बंजारे
Author: थनेश्वर बंजारे

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