रास्ते तोड़े, दीवार बनाई, फिर भी बेखौफ जारी है रेत का खेल… आखिर किसकी जिम्मेदारी?
राजिम/गरियाबंद। नदियों को बचाने और अवैध रेत उत्खनन पर अंकुश लगाने के दावे तो लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। राजिम क्षेत्र के चौबेबांधा और पितईबंद रेत खदान में अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ एक बार फिर राजस्व और खनिज विभाग की संयुक्त टीम ने कार्रवाई की। मौके पर चैन माउंटेन और जेसीबी मशीन ले जाकर रेत निकालने वाले रास्तों को तोड़ा गया। प्रशासन की इस कार्रवाई को अवैध उत्खनन रोकने की कोशिश बताया जा रहा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कार्रवाई कितनी बार होगी और इसका स्थायी परिणाम कब दिखाई देगा?
गौर करने वाली बात यह है कि चौबेबांधा क्षेत्र में पहले भी रास्ता तोड़ने के साथ दीवार खड़ी कर अवैध रेत परिवहन रोकने की कोशिश की जा चुकी है। इसके बावजूद यदि उसी क्षेत्र में दोबारा अवैध उत्खनन और परिवहन की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो यह प्रशासन की पिछली कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है। आखिर रास्ते तोड़ने के बाद भी रेत निकालने का सिलसिला कैसे जारी रह जाता है? क्या कार्रवाई के बाद दोबारा निरीक्षण और निगरानी की व्यवस्था नहीं है?
क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ रास्ता तोड़ने तक सीमित है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी रेत खदान में अवैध उत्खनन हो रहा है, तो केवल नदी तक पहुंचने वाले रास्ते को खोद देना क्या इसका स्थायी समाधान हो सकता है? जब तक अवैध उत्खनन के वास्तविक स्रोत, मशीनों के इस्तेमाल, परिवहन नेटवर्क और इसके पीछे सक्रिय लोगों की पहचान कर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी कार्रवाई का असर कितने दिनों तक रहेगा?
दूसरी ओर छोटे-छोटे ट्रैक्टरों से रेत परिवहन करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें अक्सर सामने आती हैं। कई मामलों में वाहन जब्ती और भारी जुर्माने की कार्रवाई भी होती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बड़ी मशीनों से नदी का सीना छलनी करने वाले और कथित अवैध उत्खनन के पूरे नेटवर्क पर उसी गंभीरता से कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती? कानून का प्रभाव सभी पर समान रूप से दिखाई देना चाहिए, चाहे मामला छोटा ट्रैक्टर हो या बड़े स्तर पर उत्खनन करने वाली मशीनें।
नदी की संपदा आखिर कब तक होती रहेगी प्रभावित?
पैरी नदी सहित क्षेत्र की नदियां केवल रेत का भंडार नहीं, बल्कि पर्यावरण, जलस्तर और आसपास के गांवों की जीवनरेखा हैं। अवैध उत्खनन से नदी के प्राकृतिक स्वरूप और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में प्रशासन से अपेक्षा है कि वह केवल रास्ते तोड़ने की औपचारिक कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि खदानों की वैधता की जांच, उत्खनन की अनुमति, सीमांकन, मशीनों के उपयोग, परिवहन और अवैध कारोबार से जुड़े लोगों की पहचान कर नियमानुसार ठोस कार्रवाई करे।
अब प्रशासन से जनता के सीधे सवाल—
चौबेबांधा और पितईबंद में यदि उत्खनन अवैध है तो उसे पूरी तरह बंद कराने के लिए स्थायी कदम कब उठाए जाएंगे? पहले रास्ता तोड़ने और दीवार खड़ी करने के बावजूद दोबारा उत्खनन की स्थिति कैसे बन रही है? क्या पिछली कार्रवाई के बाद जिम्मेदार विभागों ने नियमित निगरानी की? क्या केवल रास्ते बंद करने से नदी को बचाया जा सकता है या अवैध उत्खनन के पूरे तंत्र पर कार्रवाई की जरूरत है?
राजस्व और खनिज विभाग की संयुक्त कार्रवाई निश्चित रूप से एक कदम है, लेकिन जनता को कार्रवाई की तस्वीरों से ज्यादा उसका स्थायी परिणाम चाहिए। सवाल किसी कार्रवाई का विरोध करने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि नदी की संपदा सुरक्षित रहे और कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से हो।
गरियाबंद जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को अब इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। आखिर नदियों को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है और अवैध रेत उत्खनन पर स्थायी रोक कब लगेगी?
Author: थनेश्वर बंजारे
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